Saturday, 3 September 2011

महंगाई की तरप

यूपीए के दूसरी बार सत्तासीन होने के समय से ही महंगाई का सिलसिला बना हुआ है। विडंबना यह है कि महंगाई से राहत मिलना तो दूर, वह अब और बढ़ी हुई दिखाई देती है। ताजा आकलन के मुताबिक खाने-पीने की चीजों की महंगाई दस पफीसद से भी कुछ उफपर पहुंच गई है। पिछले पांच महीनों में पहली बार ऐसा हुआ है। यही भी गौरतलब है कि यह आंक़ा थोक सूचकांक पर आधरित है। जबकि लोगों का वास्ता खुदरा कीमतों से होता है। यानी आम लोग जिस महंगाई का दंश झेल रहे हैं वह और भी कष्टदारी है। यह बता ध्यान में रहनी चाहिए कि गरीब परिवारों का ज्यादातर खर्च पेट भरने पर होता है। यानी खाद्य वस्तुओं की महंगाई की सबसे ज्यादा मार उन्हीं पर पड़ती है। हमारे देश की कुल श्रम शक्ति का नब्बे पफीसद से ज्यादा हिस्सा असंगठित क्षेत्रा के लोगों का है, जिनकी आय में बहुत मामूली गति से बढ़ोतरी होती है। महंगाई के कारण उनका खर्च तो बढ़ता जाता है, पर उसकी भरपाई करने लायक पैसा उनके पास नहीं आता।
इसलिए उचित ही कई अर्थशास्त्राी महंगाई को गरीबों पर अघोषित टैक्स कहते हैं। पिछले दिनों इस तरह के आंकड़े भी आए हैं कि बहुत-से ऐसे परिवार जो पहले गरीबी रेखा से उफपर थे, महंगाई की वजह से गरीबी रेखा से नीचे चले गए। जाहिर है, महंगाई केवल बाजार की हलचल का आईना नहीं है, यह विषमता के और बढ़ने की भी सूचना देती है। महंगाई हमेशा राजनीतिक रूप से एक संवेदनशील मुद्दा रही है। इसलिए मानसून सत्रा शुरू हुआ तो विपक्ष ने सबसे वहले महंगाई पर चर्चा कराने के लिए सरकार को विवश किया, और वह भी ऐसे नियम के तहत जिसमें मतदान का प्रावधन हो। लेकिन इस बहस का लब्बोलुआब यह रहा कि बिना सरकार की जवाबदेही तय किए, सिर्पफ महंगाई पर चिंता जता कर पूरी हो गई। प्रस्ताव पर मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने सत्तापक्ष के साथ मतदान किया। पिफर यह मान लिया गया कि सरकार जल्द ही इस मोर्चे पर कोई ठोस पहल करेगी। लेकिन ताजा आंकड़ों ने बता दिया है कि हालत सुध्रने के बजाय और खराब हुई है। अब इस बात के आसार जताए जा रहे हैं कि कुछ दिनों बाद यह रिजर्व बैंक अपनी मौद्रिक नीति की समीक्षा करेगा तो ब्याज दरें एक बार पिफर बढ़ाई जा सकती हैं। रिजर्व बैंक ने पिछले साल अप्रैल से रेपो और रिवर्स रेपी दरों में लगातार बढ़ोतरी की है।
लेकिन मूल्य नियंत्राण के नाम पर उठाए गए इन कदमों को हासिल क्या रहा ?महंगाई तो थमी नहीं, अलबत्ता आवास या किसी और मकसद से लिए गए बैंक-ट्टण पर पहले से अध्कि मासिक भुगतान के लिए बहुत-से लोग विवश कर दिए गए। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक पर बुरा असर पड़ने और नए निवेश में कमी आने की आशंका भी किसी हद तक सही साबित हुई है। ऐसा लगता है कि सरकार ने महंगाई से निपटने का अपना जिम्मा रिजर्व बैंक के मत्थे मढ़ दिया है, जबकि मौद्रिक उपायों की संभावना का कापफी दोहन हो चुका है। कई चीजों के दाम सटोरियों के कारण बहुत तेजी से बढ़े हैं। प्याज इसका सबसे अच्छा उदाहरण है, जिसका दाम दो महीने में चालीस पफीसद तक बढ़ा है। दूध् के और महंगा होने की बड़ी वजह पशु आहार की कीमत में बढ़ोतरी होना है। लेकिन खली के निर्यात पर रोक लगाने की मांग पर विचार करने के लिए सरकार अभी तक राजी नहीं है। महंगाई से निपटने के लिए एक बार पिफर मौद्रिक नीति का सहारा लेने के बजाय सरकार को बेहतर भंडारण, आपूर्ति सुधरने और जमाखोरी, कालाबाजारी पर अंकुश लगाने की तत्परता दिखानी चाहिए।

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