Monday, 18 August 2014

"कर्मपथ - कर्मपथ"

जीवन को समर्पित
एक ही मंत्र ,कर्म पथ -कर्म - पथ

बचपन से लेकर अब तक
विभिन्न  राहो  पर, चलते हुए
मंजिल  तक, पहुचने  को आतुर
मेरा yah मन ,कहता  है -पथिक
तू निरंतर बढ़ता चल ,यही है तेरा कर्मपथ
अच्छाइयों  के फूल ,खिलाना  है तुम्हे
बुराइयों  के  काटो  से  ,करना  होगा  संघर्ष
रुकना  नहीं  पथिक ,थकना  नहीं  पथिक
बुराइयों  के  कांटे  ,तुम्हे  पथ  पथ  पर  रोकेंगे
अच्छाइयों  के  बल  पर  चलता  रह
अपने  कर्म  पथ  अपने  कर्म  पथ
श्री  कृष्ण  हो  या  श्री  राम
ईसा  हो  ,गुरु गोविन्द  या  मो. हजरत
सभी  को  करना  पड़ा  है संघर्ष  ,बुराइयों  से
तब  ही  खिला  है ,अच्छाइयों  का  फूल
चारों  दिशाओं में फैली  है उसकी  सुगंध
पथिक  चलता  रह  ,कर्म  पथ  -कर्म  पथ

सब जानते   है ,जो  आया  है वह  जायेगा
भरम  में  उलझ  कर  ,भूल  जाते  है कर्म  पथ
अच्छाइयों  को  त्याग  ,
बुराइयों   को  आणिक   स्वार्थवश  कर  लेते  है आत्मसाध  ,
जीवन  समाप्त   हो  जाता
उन्हें  नहीं  मिल  पता  ,सुगंध
पथिक  ,तू - मत  भटक
चिरकाल  तक  ,याद  करेगी  धरा
तुम्हारे  संघर्ष  को  ,तू  सदा  बढ़ताचल  
कर्म  पथ - कर्म  पथ - कर्म पथ !                  

                                           ललित "सुमन"

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