Wednesday, 8 January 2014

कहां खो गया, मेरा बचपन...



कहां खो गया, मेरा बचपन...

ढूढ़ता हूं, कहां खो गया, मेरा बचपन
बुढ़ापे की इस दहलीज पर।
मां जब चिमटे से, पकड़ कर रोटी,
दुध के कटोरे में डाल, प्यार से पुचकारती
कहती, खा ले बेटा, तुम अब बड़े हो रहे हो।
पिताजी की वह आवाज, अभी तक सोया है
क्या स्कुल नही जाना, सात बज चुके हैं।
बड़े भाई-बहनों की ठिठोली, होमवर्क नहीं किया है।
दोस्तों को क्रिकेट का बल्ला लिए, खिड़की
से, धीमी आती आवाज, पड़ोसी के मोहल्ले के
बच्चों से, पापिन्स की शर्त पर, आम के बगीचे
में, जीत की, शर्त लगी है।
ढूंढ़ता हुं, कहां खो गया, मेरा बचपन
बुढ़ापे की इस दहलीज पर।
गर्मी की छुट्टी, आम का बगीचा
खेतो में काम करते मजदूर, मिट्टी में लोढ़ते उनके बच्चें
कपड़े उतार, तालाब में तैरते बच्चों की
झुण्ड, रोक नही पाता अपने-आप को
उतार फेकता, अपना वस्त्र, कुद जाता तालाबों में
आजाद पंक्षी की तरह, वगैर कुछ सोचे
ढूंढ़ता हुं, कहां खो गया, मेरा बचपन
बुढ़ापे की इस दहलीज पर।
सब कुछ छोड़ आया, अपने गावों में
यह सोचकर, कामयाब होकर लौटूंगा
अपने गांव, फिर से आम के बगीचे में
मन-भर तैरूंगा, तालाब में, खेलूंगा दोस्तों के साथ
इसी उम्मीद में, कब गुजर गया
बचपन-जवानी, अब ढूंढ़ता हूं
कहां खो गया, मेरा बचपन।
बुढ़ापे की इस दहलींज पर।

पुछता है बेटा, पापा क्यों चुप हो
अकसर आप टेंनशन में, क्यों दिखते हो
बात-बात पर क्यों, चिखतें हो।
मकान, दुकान, गाड़ी, सभी कुछ है आपके पास
फिर पहले कि तरह, क्यों नहीं हंसते हो।
पिता के खोने का गम, मां की बिगड़ती सेहत
भाई-बहनों, परिवार से, जुदा रहने का गम
बच्चों के भविष्य की चिंता, पति-पत्नी की बढ़ती उम्र
देश में बढ़ती, महंगाई, भ्रष्टाचार, परिवार का बढ़ता खर्च
चिंता बढ़ा, चिता तैयार कर रही है
क्या बताउ , उस मासूम को
जिसका बचपन, अभी शुरू हुई है।

ढूंढ़ता हुं, कहां खो गया, मेरा बचपन
बुढ़ापे की इस दहलीज पर।

......ललित 'सुमन' 

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