Monday, 18 August 2014

"परायों"  को  भी "अपना" कर 

गिला -शिकवा , छोड़  दो  यारों
सबको , एक   दिन  जाना है।
अपना  पराया , कौन  है जग  मै
सबको  एक दिन  जाना है।
मुट्ठी  बंद  करके  तुम   आये  थे
खाली हाथ ही जाना है
अपना  पराया  कौन  है  जग  मई
सबको  एक  दिन  जान है।
इतराने दो उनको यारों
जो दौलत  पा   कर  इतराते  है
इतराने दो उनको  यारों
जो  शक्ति  पाकर  ,रौब दिखाते है
इतराने  दो  उनको   यारों
जो  अपना वैभव दिखाते है
अपना पराया कौन है जग  में
सबको एक दिन जाना है।

बता सको तो नाम बताओ
कौन -कौन दौलतमंद यहाँ जनम लिया
बता सको तो नाम बताओ
कौन शक्तिमान अब याद रहा
बता सको तो नाम बताओ
किसकी वैभव जिन्दा  है
इतिहास उसी को याद रखता
जिसके आँगन अच्छाइयां पलटी है
जो देता क़ुरबानी ,वाही अमित छाप छोड़ता है
बुराइयों से लड़कर ,अच्छाइयों का पुष्प
खिलताhai ,खुशबू उसकी सदा सदा
करो और फैलती है
अपन पराया कौन है  जग में
सबको एक दिन जाना है।

इतिहास भरा है शूरवीरो से
कायरो को कब ,कौन पूजता है
जन्मmila है "मानव" का तो
"मानवता" की तू रक्षा कर

अपना पराया का भेद मिटा कर
परायों को भी अपना कर
गिला शिकवा छोड़ दो यारो
सबको एक दिन जाना है

अपना पराया कौन है जग में
सबको एक  दिन जाना है...
                                                 ललित "सुमन"



"कर्मपथ - कर्मपथ"

जीवन को समर्पित
एक ही मंत्र ,कर्म पथ -कर्म - पथ

बचपन से लेकर अब तक
विभिन्न  राहो  पर, चलते हुए
मंजिल  तक, पहुचने  को आतुर
मेरा yah मन ,कहता  है -पथिक
तू निरंतर बढ़ता चल ,यही है तेरा कर्मपथ
अच्छाइयों  के फूल ,खिलाना  है तुम्हे
बुराइयों  के  काटो  से  ,करना  होगा  संघर्ष
रुकना  नहीं  पथिक ,थकना  नहीं  पथिक
बुराइयों  के  कांटे  ,तुम्हे  पथ  पथ  पर  रोकेंगे
अच्छाइयों  के  बल  पर  चलता  रह
अपने  कर्म  पथ  अपने  कर्म  पथ
श्री  कृष्ण  हो  या  श्री  राम
ईसा  हो  ,गुरु गोविन्द  या  मो. हजरत
सभी  को  करना  पड़ा  है संघर्ष  ,बुराइयों  से
तब  ही  खिला  है ,अच्छाइयों  का  फूल
चारों  दिशाओं में फैली  है उसकी  सुगंध
पथिक  चलता  रह  ,कर्म  पथ  -कर्म  पथ

सब जानते   है ,जो  आया  है वह  जायेगा
भरम  में  उलझ  कर  ,भूल  जाते  है कर्म  पथ
अच्छाइयों  को  त्याग  ,
बुराइयों   को  आणिक   स्वार्थवश  कर  लेते  है आत्मसाध  ,
जीवन  समाप्त   हो  जाता
उन्हें  नहीं  मिल  पता  ,सुगंध
पथिक  ,तू - मत  भटक
चिरकाल  तक  ,याद  करेगी  धरा
तुम्हारे  संघर्ष  को  ,तू  सदा  बढ़ताचल  
कर्म  पथ - कर्म  पथ - कर्म पथ !                  

                                           ललित "सुमन"

Monday, 17 February 2014

सम्पादकीय:- उपराज्यपाल पर अब सारी जिम्मेदारी

दिल्ली विधानसभा  चुनाव परिणाम आने के साथ ही यह स्पष्ट हो चुका था कि दिल्ली की आवाम ने दिल्ली को बीच मझधार  में लाकर खड़ा कर दिया है और कांग्रेस-भाजपा को दरकिनार कर एक नइ पार्टी आप पर भी हद से अधिक भरोसा नहीं किया। भाजपा को 32, आप को 28 और कांग्रेस को सत्ता से दूर करते हुए 8 सीट पर समेट कर अपने आक्रोश की ज्वाला को भले शांत किया लेकिन सभी पार्टियों को अग्नि  परीक्षा देने के लिए विवश कर दिया।  दिल्ली के उपराज्यपाल डा. नजीब जंग ने बड़ी पार्टी के नाते भाजपा को आमंत्रित किया लेकिन भाजपा बहुमत नहीं होने की बात कह सत्ता बनाने से इंकार कर दिया। दूसरी बड़ी पार्टी आप को कांग्रेस ने समर्थन दिया लेकिन आप ने समर्थन पत्र  प्राप्त होने के बावजूद जनता से रायसुमारी की और सरकार बन गइ। उपराज्यपाल ने पद एवं गोपनीयता की शपथ आप मंत्री मंडल को दिलाकर अपने कर्त्तव्य  का पालन किया।
 49 दिनों के अंदर कइ घटनाक्रम घटित हुइ और तरह-तरह के मसले आमलोगों के सामने आये जो आज तक दिल्ली की जनता ने दूसरे प्रदेशों के संदर्भ में मीडिया के माध्यम  से देखा व सूना था लेकिन पहली बार वे अपने राज्य में अपने आंखों से देखा कि सत्ता और सत्ता संचालन के दरम्यान दिल्ली की सरकार के सामने किस-किस प्रकार की समस्याएं आती है और एक मुख्यमंत्री  को किस प्रकार संघर्ष करके दिल्ली की जनता के हीत में विकास कार्य का निष्पादन करना पड़ता है। दिल्ली में पांच वर्ष भाजपा ने शासन किया लेकिन उसे तीन मुख्यमंत्री  बनाने पड़े। मदन लाल खुराना के त्याग व तपस्या को दरकिनार करना भाजपा को इतना भारी पड़ा कि आज तक वह सत्ता वापसी के लिए खून-पसीना बहा रही है लेकिन दिल्ली की जनता का दिल नहीं जीत पा रही है। मदन लाल खुराना ने हवाला कांड डायरी में नाम आने पर आडवाणी के साथ पद त्याग कर अपने नैतिकता व उच्च चरित्रा का परिचय दिया, लेकिन भाजपा ने अपने उस कर्मयोगी को दरकिनार कर दिल्ली की जनता का विश्वास खो दिया।
 कांग्रेस को दिल्ली की जनता ने मौका दिया। शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार तीन बार बनी दिल्ली ने विकास किया, जो साफ नजर आ रहा है, लेकिन इस बार दिल्ली की जनता ने न सिर्फ  कांग्रेस को आठ सीट पर समेट दिया बल्कि  मुख्यमंत्री  शीला दीक्षित को पढ़े-लिखे वर्ग  ने नकार दिया और उन्हें पराजय का मुंह देखना पड़ा, कारण स्पष्ट था। दस वर्ष शीला दीक्षित सरकार ने जमकर काम किया लेकिन तीसरी बार चुनाव जीतने के उपरांत कांग्रेस ने युवा वर्ग  के लिए, आमलोगों के लिए वह कार्य नहीं किया जिसकी उम्मीद दिल्लीवासी कर रहे थे। मंहगाइ-भ्रष्टाचार के साथ कांग्रेस की आपसी गुटबाजी से दिल्ली का आम जनता त्रस्त रही, उसका सूनने वाला कोइ नहीं था, भाजपा-कांग्रेस के नेता अपने-अपने क्षेत्र  में सांठ-गांठ कर लिया, निगम में भाजपा लुटती रही, प्रांत में कांग्रेस, बेचारी जनता पिसती रही, तत्कालीन उपराज्यपाल, तेजेन्द्र खन्ना भी कांग्रेस व भाजपा के कुछ विधायक  को अपने पक्ष में कर आम जनता की हित से अधिक शीला सरकार को कमजोर व भाजपा-कांग्रेस नेताओं को संरक्षण देते रहे। दिल्ली की जनता आखिर कहां अपनी फरियाद लेकर जाये। वह पिसती रही, खामोश रही, अन्दर-अन्दर सुलगती रही और जब अन्ना हजारे का आन्दोलन हुआ सड़कों पर उतर आयी। अरविन्द केजरीवाल ने विश्वनाथ प्रताप सिंह की तरह जनता के आक्रोश को समझा और राजनीतिक आखाड़े में कुद गये।
 सच्चाइ यही है इसे जिसको जिस रूप में मुल्यांकन करना है, विवेचना करना है करता रहे। भाजपा ने मदन लाल खुराना को दरकिनार कर गुटबाजी के माध्यम  से सत्ता तो प्राप्त कर, सत्ता सुख भोग लिया लेकिन कभी सशक्त विपक्ष की भूमिका अदा नहीं किया अगर वह सशक्त विपक्ष की भूमिका अदा किया होता तो 2009 के चुनाव में वह सत्ता में वापस आ सकती थी। भाजपा पुन: बार-बार वही गलती दुहरा रही है, कभी विजेन्द्र गुप्ता को आगे करती है, कभी विजय गोयल को आगे करती है, कभी हर्ष वर्धन  को आगे करती है। खुराना के बाद अगर भाजपा में प्राण अगर किसी ने फूंका  तो वह विजेन्द्र गुप्ता है, जुनियर-सीनियर की लड़ाइ में भाजपा जनता के दिलों में विश्वास स्थापित करने में नाकामयाब रही। क्या कारण है दो वर्ष पुरानी एक युवाओं की टीम इतनी-पुरानी कांग्रेस व भाजपा को चुनौती देने में न सिर्फ कामयाब रही बलिक 28 सीट प्राप्त कर दिल्ली में 49 दिन सरकार चला कर पुन: कांग्रेस-भाजपा को कठघड़े में खड़ा कर एक नइ पारी की शुरूआत करने पूरे देश में निकल पड़ी है। दिल्ली की जनता या देश की जनता सब कुछ देख रही है, वह सब कुछ समझती है, जो पुराने लोग हैं वे ये जानते होंगे कि जब देश आजाद हुआ था तो कइ नेता चुनाव के पक्ष धर नहीं थे लेकिन नेहरूजी ने उस वक्त चुनाव कराया, जनता पर भरोसा किया और देश की जनता भले, भूखे पेट रहे, वस्त्र न हो, इलाज के पैसे न हो लेकिन अपने राष्ट्र के स्वाभिमान के लिए अपना बलिदान देने में कभी पीछे नहीं रहा है, इतिहास इस बात का गवाह है आज भारत एक विशाल लोकतांत्रिक राष्ट्र है तो इसका प्रमाण यही है।
 अरविन्द केजरीवाल एवं उनका मंत्रिमंडल  नये लोगों का संगठन है, पहली बार सभी चुनकर आये थे, क्या हमारे पुराने विधयकों, मंत्रियों का यह दायित्व नहीं बनता था कि वे उन्हें यह बताते की एक राज्य को सुचारू रूप से चलाने के लिए बजट की आवश्यकता होती है, विकास की गति बनाये रखने के लिए इस प्रकार की योजना बनानी पड़ती है, लेकिन सरकार बनने के साथ ही राजनीति शुरू हो गइ, सरकार को घेरो, बदनाम करो, उलझाओ। अगर पुराने नेता राजनीति इसे कहते है तो आम आदमी पार्टी ने भी वही किया जो वे करते है तो फिर इसमें गलत क्या है। अन्य नेता मीडिया व समाचार पत्रों  में सुर्खियां  बनाने के लिए मीडिया का उपयोग करे तो सही, आम पार्टी बोले तो गलत, आप संविधन की उपेक्षा करो तो सही, आम पार्टी करे तो गलत आखिर ऐसा क्यों। गलत तो गलत है चाहे वह कोइ करे। अरविन्द केजरीवाल ने विधानसभा  के अंदर कांग्रेस भाजपा पर सीधा  आरोप लगाया कि अम्बानी से भाजपा कांग्रेस दोनों चंदा लेती है उसके खिलाफ एफआर्इआर का उन्होंने आदेश दिया, इसलिए दोनों दल मिलकर जनलोकपाल बिल सदन में नहीं आने दे रहे। यह पूरी तरह राजनीतिक विचार कहा जा सकता है लेकिन यही आरोप तो दिल्ली में भाजपा, कांग्रेस सरकार पर व केन्द्र में भाजपा, कांग्रेस की सरकार पर इसी तरह की अनेकों आरोप बेगैर सिर-पैर की लगाती रही है। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जिस बोफोर्स घोटाला के नाम पर कांग्रेस को सत्ता से हटाया था वही बोपफोर्स तोप कारगिल युद्ध में भारतीय सेना का मस्तक ऊंचा किया था।
 सिख दंगा का मामला बीस वर्षों  से दिल्ली में 36 रहा था, भाजपा ने भी शासन किया, अकाली उनके मित्र  है लेकिन उन्होंने एसआर्इटी क्यों नहीं बनवाया। क्या भाजपा इसका जवाब दिल्ली की जनता को देगी। केजरीवाल ने राजनीति ही किया हो लेकिन सिख विरादगी के घाव पर मरहम तो लगाया, आपने ऐसा करना अपना कर्त्तव्य  क्यों नहीं समझा। पहले भी उपराज्यपाल थे, डा. नजीब जंग ही एसआर्इटी के लिए क्यों?  दिल्ली के उपराज्यपाल डा. नजीब जंग के पास एक बेहतरीन मौका है। इश्वर जब किसी से अति प्रसन्न होता है तो उसके सामने चुनौती पेश करता है ताकि वह अपनी दक्षता व क्षमता का प्रयोग कर इतिहास में अपने नाम दर्ज करा ले। डा. नजीब जंग को खुदा ने यह अवसर दिया है, वे राष्ट्रपति के दिल्ली में उत्तराधिकारी है, भूमि, पुलिस व कानून व्यवस्था सभी कुछ उनके पास है। विगत 20 वर्षों  में दिल्ली में जिनते भ्रष्टाचार हुए है उसकी निष्पक्ष जांच कराकर दिल्ली की जनता के दिल व दिमाग में यह बैठा दें कि कानून अभी जिंदा है। दिल्ली में जितने भूमि घोटाले हुए है, डीडीए प्लाट, आदि पर भू-माफियाओं  ने कब्जा कर रखा है उसे मुक्त कराकर इतिहास रच दें, दिल्ली की सड़कों पर और अपने घरों में लोग यह महसूस करें कि कोइ उनकी सुरक्षा के लिए सजग है तो क्या दिल्ली में राम-राज्य नहीं आ जायेगा।  उपराज्यपाल डा. नजीब जंग प्रशासनिक अधिकारी, रंगमंच के कलाकार, शिक्षाविद होने के साथ-साथ दिल्ली के उपराज्यपाल है और इश्वर ने उन्हें राजनीतिक दक्षता का परिचय देने का अवसर दिया है यह किसी कुदरती करिश्मा से कम नहीं है। वर्ष-2014-15 का बजट, बिजली कम्पनियों को पैसा, जल बोर्ड के विकास  प्रोजेक्ट, दिल्ली विश्वविधालय में गर्वनिगबडी विधायक  फंड, आदि मुददें रोजमर्रा का मुददा है लेकिन सबसे बड़ी बात है दिल्ली वासियों के दिल में कानून के प्रति विश्वास व संविधन के प्रति आस्था का विश्वास कायम करना। यह बेहतरीन मौका डा. नजीब जंग को समस्याओं के निदान के साथ इतिहास रचने के लिए कुदरत का तोहफा है।
ललित "सुमन" 

Thursday, 16 January 2014

दिल्ली सिर्फ केजरीवाल का?

केजरीवाल सरकार अगर वास्तव में आम आदमी की भला चाहती है तो उन्हें संगठित अपराध्, संगठित भ्रष्टाचार पर प्रहार करना होगा तभी दिल्ली का सामुहिक विकास सम्भव है, आम लोंगो के बीच उनकी सरकार की छवि लोकनायक के रूप में स्थापित होगा, अन्यथा देश की जनता पुन: नये देवदुत का इंतजार करेगी। यह देश व दिल्ली प्रदेश सिर्फ केजरीवाल का नहीं है, इसे सभी को मिलकर बेहतर बनाना होगा, यह किसी दबाव में नहीं, अंर्तआत्मा की आवाज पर होनी चाहिए कि आने वाली पीढ़ी को हम क्या देकर जाने वाले हैं।  

भारत की राजधानी  दिल्ली व केन्द्रशासित प्रदेश दिल्ली सिर्फ केजरीवाल का है, ऐसा ही लगता है। 15 वर्षों से लगातार प्रदेश पर शासन करने वाली कांग्रेस व पूर्व के वर्षो में पांच वर्ष शासन कर चुकी भाजपा, लगातार एक माह भी नहीं गुजारी, आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविन्द केजरीवाल की सरकार से पुछ रही है कि दिल्ली में पानी की समस्या का क्या हुआ, बिजली व्यवस्था का क्या हुआ, भ्रष्टाचार निदान का क्या हुआ, ला एण्ड आर्डर का क्या हुआ, काश्मीर मुददे पर क्या सोच है, नक्सल मुदे पर क्या राय है, देश की आर्थिक नीति पर आम आदमी पार्टी की क्या नजरिया है, बड़े मकान, छोटे मकान, सुरक्षा लेंगे-नहीं लेंगे आदि-आदि अनेको सवाल किया जा रहा है।
  आप अगर एक मकान से, दुसरे मकान में शिफ्ट  होते हैं तो उसे व्यवस्थित  करने में छ: महिना लग जाता, फिर  भी कई  समान नहीं मिलते। आम आदमी पार्टी में सिर्फ विन्नी एक मात्र   नेता है जो निगम पार्षद रह चुके हैं और सारा देश यह देख रहा है कि ''विन्नी'' जिददी बच्चे की तरह किस प्रकार अड़े है कि हमें भी खेलने दो, नहीं तो मैदान खोद डालूंगा। भारत की जनता इस बात का अंदाजा सरलता से लगा सकती है कि आम आदमी पार्टी का मैदान खोदकर भ्रष्टाचारनिदान, विकास के कार्य को अवरुद्ध  रखा जाय तो इससे किसका भला होने वाला है।
    दिल्ली प्रांत या यह देश अकेला अरविन्द केजरीवाल का नही है, एक अरब से अधिक की आबादी वाले इस मुल्क में से अरविन्द केजरीवाल भी एक नागरिक हैं, लेकिन अरविन्द केजरीवाल की नियत है कि यह देश भ्रष्टाचार मुक्त हो, और नीति यह है देश पुन: सोने की चिडि़या बने, दुध् की नदियां बहे।
कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा, राजद, जदयू, सी.पी.आर्इ.एम, अन्ना द्रमुक, एनसीपी, त्रिनमूल आदि अनेकों पार्टी की तरह ''आम आदमी पार्टी''  भी एक है। देश के कोने-कोने में बनी क्षेत्रीय पार्टी या अपने को राष्ट्रीय पार्टी कहने वाले क्या इस देश की जनता को यह बताएंगे कि किस पार्टी ने एक माह के अन्दर ''आम आदमी पार्टी'' की तरह अपने घोषणा पत्रों  के मुख्य मुद्वों को इस प्रकार अमली जामा पहनाने का प्रयास किया है।
       जो काम करता है गलती भी, भूल भी उसी से होती है, गलती की सजा व भूल  का सुधार  कर आगे बेहतरीन कार्य किये जा सकतें हैं लेकिन जो काम ही न करे, उसे क्या कहा जाएगा। वह देश का, समाज का, आम व्यकित का शुभचिंतक है या दुश्मन।
      कांग्रेस पार्टी इस देश पर सबसे अधिक शासन किया है। कांग्रेस पार्टी ने इस देश में अनेकों विकास कार्य किये है, भारत आज अगर विकासशील देश से आगे विकसित राष्ट्र की ओर कदम बढ़ा रहा है तो इसका अर्थ है, कांग्रेस ने राष्ट्रहीत, समाजहीत व आम जन के हीत में कार्य किया है, यह सत्य है कि कांग्रेस के कुछ नेताओं ने भ्रष्टाचार को बढ़ाया, जमकर राष्ट्र को लूटा, अपनी सेहत बनाया, इन्हें दंडित किया जाना चाहिए। लेकिन यह भी सत्य है कि सूचना का अधिकार, खाध सुरक्षा अधिकार, भूमि अधिग्रहण विधेयक  जैसे मुद्वों के अतिरिक्त भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए लोकपाल विधेयक  पास कराने में समप्रग सरकार कामयाब हुई  है। हो सकता है, कुछ मुद्वों में और सुधार की आवश्यकता हो, इसे दुर किया जाना चाहिए, यह समप्रग सरकार की आम जनता के प्रति जिम्मेदारी है।
    समप्रग सरकार बनने से पूर्व विपक्ष भी सत्ता सुख भोगा है, अटल बिहारी वाजपेयी, एच.डी. देवगौड़ा, इन्द्र कुमार गुजराल, वी.पी. सिंह, चन्द्रशेखर आदि भी केन्द्र की सरकार में प्रधानमंत्री  रह चुके हैं, क्या उस वक्त भारत भ्रष्टाचार मुक्त था, देश में किसान ने आत्महत्या नहीं किया, नारी उत्पीड़न के मामले नहीं थे, बेरोजगारी नहीं था, सभी ने अपने स्तर से राष्ट्र निर्माण का प्रयास किया, उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए समप्रग सरकार भी लगातार राष्ट्र उत्थान में लगी है। देश के आवाम को लगेगा कि समप्रग सरकार अपने दायित्व निर्वाह में नाकामयाब रही है तो जनता उसे सत्ता से विमुख कर देगी लेकिन नरेन्द्र मोदी भाजपा के पी.एम. इन वेटिंग करोड़-करोड़ रूपये सभाओं पर खर्च कर सिर्फ अपनी छवि सुधरने व भारत सरकार की छवि देश व विदेश में खराब कर रहे हैं, यह राष्ट्रहीत में नहीं है।
     नरेन्द्र मोदी को देश को यह बताना चाहिए कि मंहगाइ दर इस नीति से कम किया जा सकता है, भ्रष्टाचार को ऐसे नियंत्रित किया जा सकता है, बेरोजगारी कम करने के लिए इस प्रकार रोजगार के साधन उत्पन्न किये जा सकते हैं, देश को विकसित करने के लिए यह कदम कारगर हो सकते हैं, कृषक की भलाइ के लिये उनका विजेन यह है, न्याय व्यवस्था इस प्रकार सुदृढ़ हो सकती है, भारत की संस्कृति व सभ्यता को इस प्रकार अक्षुण्य रखा जा सकता है, लेकिन मोदी को तो सिर्फ गुजरात, व अपनी छवि बेहतर नजर आ रही।
    सवाल यह उठता है कि हाइटेक मंच बनाने पर जो राष्ट्र का धन खर्च हो रहा, क्या वह कालाधन  है, भाजपा का राजनीतिक फंड है, या देश को अस्थिर  करने वालों तत्वों से एकत्रा किया जा रहा है, वह कौन लोग हैं और केन्द्र में सरकार बनने पर वह इसकी क्या कीमत वसूल करेगा, मोदी उसके साथ क्या समझौता कर रखें हैं।
    देश का प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी बनें, राहुल गांधी  बनें, केजरीवाल बनें, प्रियंका गांधी  बनें, ममता बनर्जी बनें, मनोहर पारिक बने हमें क्या, अंतर पड़ता है। 18 घंटे काम, मुझे आज भी करना पड़ता है उस वक्त भी करना पड़ेगा। यह सत्य है कि भारत अगर भ्रष्टाचार मुक्त राष्ट्र बनेगा, मंहगाइ पर नियंत्रण  हो जायेगा तो समाज के अंतिम पंक्ति  में खड़े व्यकित भी राहत की सांस लेंगा।
     बात शुरू हुर्इ थी केजरीवाल से और पहुंच गइ राष्ट्र पर । केजरीवाल को काम करने का मौका मिलनी चाहिए और केजरीवाल को भी एक निर्भीक, निष्पक्ष राजनेता की तरह एक-एक कर समस्याओं के निदान की दिशा में कदम-दर-कदम बढ़ाना चाहिए। केजरीवाल को सर्वप्रथम दिल्ली को भ्रष्टाचार मुक्त करने की दिशा में, योजनावद्व तरीके से प्रयास करना चाहिए था, लेकिन दिशा भटकता नजर आ रहा है।
   व्यकितगत अपराध् व संगठित अपराध् व भ्रष्टाचार में अंतर है। केजरीवाल सरकार को इसे समझना होगा। अपराध्-अपराध् है, भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार है लेकिन दोनों में अंतर है। व्यक्तिगत  अपराध् और व्यक्तिगत भ्रष्टाचार से एक व्यक्ति  या परिवार प्रभावित होता है लेकिन संगठित भ्रष्टाचार व संगठित अपराध् से समाज व राष्ट्र प्रभावित होता है। अगर विषैले पेड़ को जड़ समेत उखाड़ दिया जाय तो व्यक्ति, समाज व राष्ट्र का स्वत: भला हो जाएगा।
     केजरीवाल सरकार अगर वास्तव में आम आदमी की भला चाहती है तो उन्हें संगठित अपराध्, संगठित भ्रष्टाचार पर प्रहार करना होगा तभी दिल्ली का सामुहिक विकास सम्भव है, आम लोंगो के बीच उनकी सरकार की छवि लोकनायक के रूप में स्थापित होगा, अन्यथा देश की जनता पुन: नये देवदुत का इंतजार करेगी। यह देश व दिल्ली प्रदेश सिर्फ केजरीवाल का नहीं है, इसे सभी को मिलकर बेहतर बनाना होगा, यह किसी दबाव में नहीं, अंर्तआत्मा की आवाज पर होनी चाहिए कि आने वाली पीढ़ी को हम क्या देकर जाने वाले हैं।















ललित ''सुमन'', प्रधान संपादक 
अध्यक्ष, दिल्ली प्रदेश 
आल इंडिया स्मॉल एण्ड  मीडियम न्यूज़ पेपर्स 
फेडरेसन ( रजि.)  

Monday, 13 January 2014


"दिल्ली में अब नहीं लगेगा जनता दरबार" : अरविंद केजरीवाल

 "सही कदम  है ,भीड़ एकत्र होने से समय कि बर्बादी होती है, काम करने के लिए दृढ़ इच्छा शक्ति व दर्पण की तरह सच्चाई दिखाने का होसला होना चाहिए".... ललित 'सुमन' 

Thursday, 9 January 2014

चाय बेचने वाला....


चाय बेचने वाला.... 

चाय बेचने वाला ही क्यो? कोई भी भारतीय नागरिक, भारत का प्रधानमंत्री  बनने का अधिकार  रखता है। नरेन्द्र मोदी तो आम आदमी से खास व्यक्ति हो चुके हैं, उन्होनें अपनी दावेदारी प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा से पेश करवाया है, तो इसमें हर्ज क्या है। प्रत्येक वह व्यक्ति सपना पालता है जिसका पेट भरा होता है। आम आदमी तो, ‘रोटी-कपड़ा-मकान, ईलाज, रिश्तेदारी, भाईचारा’ में ही इस कदर उलझा रहता, कि उसे पता ही नही चलता बचपन-जवानी-बुढ़ापा और कब मौत हो गई, उसके मरने के बाद यह चर्चा होती है, बड़ा नेक व्यक्ति था, मिलनसार था, लोगों के लिए मददगार था, बहुत अच्छा लेखक, कवि, पत्रकार ...न जाने क्या-क्या गुण उसके अन्दर थे, स्वाभिमानी था, देशभक्ति की ऐसी भावना थी कि जन-गण-मन की राष्ट्रीय धुन कही पर सुनाई पड़े, वही खड़ा हो जाता था, आज वह हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनकी याद हमेशा हमें सताती रहेगी। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दें, अपनी चरणों में प्रभु स्थान दें। इस दुःख की घड़ी में प्रभू उनके परिवार को यह दुःख सहने की शक्ति प्रदान करें। आम आदमी इसी प्रकार आता है, और चला जाता है। कई तो, ऐसे चले जाते कि लोंगो को पता भी नहीं चलता, रामदीन इस दुनिया से कब चला गया।
   यह है आम आदमी। नरेन्द्र मोदी, राहुल गांधी, नीतिश, लालू, मुलायम जैसे व्यक्ति तो अब इस देश के खास व्यक्ति हैं, अब वे आम आदमी की समस्याओं से उफर उठ चुके हैं, उन्हे सपने देखने का पुरा अधिकार है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बन चुकी है, अरविन्द केजरीवाल भी उस पंक्ति में आकर खड़े हो गये हैं, जिन्हें सपना देखने का पुरा अधिकार  है। उनकी जो रोज-मर्रा की आवश्यकता है, वह तो वह आम आदमी द्वारा प्राप्त टैक्स की राशि से स्वतः ही पुरा हो जाएगा, जैसे अन्य खास व्यक्तियों का होता है। केजरीवाल को यह तय करना है कि पहले दिल्ली के आम लोगों  का, जो सपना है, उसे वे पुरा करते हैं या मुख्यमंत्री  के बाद प्रधानमंत्री  का सपना पाल लेते हैं।
   देश को बेहतर प्रधानमंत्री मिले, यह प्रत्येक भारतीयों का सपना है, मोदी-राहुल-केजरीवाल......जिनमें यह दक्षता है, जो इस देश के आम आदमी को सपना देखने लायक बना सकतें हैं, उनका स्वागत है।
   चाहें वह, चाय बेचने वाला हो, शहजादा हो या कोई और क्यों न हो, देश के करीब साढ़े बहत्तर करोड़ मतदाताओं को तो सिर्फ ऐसा व्यक्ति चाहिए, जो आम व्यक्ति को सपना देखनें लायक बना सके, वही इस देश का प्रधानमंत्री बनें।
  भाजपा के पी.एम. इन वेटिंग नरेन्द्र मोदी को देश को यह बताना चाहिए कि आप जिस गुजरात प्रदेश के तीन बार मुख्यमंत्री  चुने गये हैं, वहां आम आदमी के लिए केन्द्र सरकार ने जो ‘मनरेगा’ कार्यक्रम चला रखा है, वह धरातल  पर क्यों नही उतर रहा! क्या सच में आम आदमी के लिए दिया गया ‘मनरेगा’ का फंड, दुसरे कार्यो में स्थानांतरित किया गया है! क्या संसदीय समिति के निर्देश पर केन्द्र सरकार ने, कई दफा आपको पत्र लिखा। आम आदमी के लिए दिए गये पैसे का, दुरूपयोग हुआ और हो रहा है, गुजरात के मुख्यमंत्री  ने उस अधिकारी  के खिलाफ क्या कार्रवाई की, जो आम आदमी के पेट पर प्रहार करने की साजिश रची है। साथ ही आपको यह बताना चाहिए कि अगर देश के मतदाताओं ने आपको प्रधानमंत्री के लिए समर्थन दिया तो, आप रास्ट्रहीत में क्या-क्या करेंगे, जिससे इस देश का आम आदमी, सपना देखने की स्थिति में पहुंच जायेगा।
   कांग्रेस अगर राहुल गांधी  को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाती है तो राहुल गांधी  भी देश के आम आदमी को यह बताये कि पांच वर्षो के लिए उनकी राष्ट्र विकास दृष्टि क्या है, आम आदमी क्या सपना देखने लायक बन सकेगा, उसकी आत्मा यह स्वीकार करेगी कि, ‘भारत की तस्वीर और आम लोगों की तकदीर बदलने का जज्बा आपके अंदर है।’
इसी प्रकार जिन-जिन खास व्यक्तियों ने प्रधानमंत्री बननें का सपना देखा है, वे इस राष्ट्र के आम आदमी को बताये कि राष्ट्र निर्माण की दिशा में उनका विजेन (दृष्टि) क्या है। जाति-धर्म, अगड़ा-पिछड़ा, भाई-भतीजावाद इस लोकसभा चुनाव में नही चलेगा। भारतीय मीडिया (इलेक्ट्रोनिक, प्रिंट व सोशल मीडिया)  काफी सशक्त हो चुका है, ये बातें प्रधानमंत्री पद का मुंगेरी लाल के हसीन सपने पाले, खास आदमी को समय रहते समझ में आ जानी चाहिए।

नफरत की दिवाल गिराकर, बढ़ों राष्ट्र निर्माण की ओर,
आने वाली पीढ़ी, यह न बोले, नेताओं की सोच ही, गंदी थी।
सपने देखने की आजादी हो, अराजकता फैलाने की नहीं
अपने-अपने हिस्से का, हिन्दुस्तान बेचने का नहीं
अपने-अपने हिस्से का, हिन्दुस्तान बचाने की जदों-जहद हो!

.............................................................................ललित 'सुमन'

Wednesday, 8 January 2014

कहां खो गया, मेरा बचपन...



कहां खो गया, मेरा बचपन...

ढूढ़ता हूं, कहां खो गया, मेरा बचपन
बुढ़ापे की इस दहलीज पर।
मां जब चिमटे से, पकड़ कर रोटी,
दुध के कटोरे में डाल, प्यार से पुचकारती
कहती, खा ले बेटा, तुम अब बड़े हो रहे हो।
पिताजी की वह आवाज, अभी तक सोया है
क्या स्कुल नही जाना, सात बज चुके हैं।
बड़े भाई-बहनों की ठिठोली, होमवर्क नहीं किया है।
दोस्तों को क्रिकेट का बल्ला लिए, खिड़की
से, धीमी आती आवाज, पड़ोसी के मोहल्ले के
बच्चों से, पापिन्स की शर्त पर, आम के बगीचे
में, जीत की, शर्त लगी है।
ढूंढ़ता हुं, कहां खो गया, मेरा बचपन
बुढ़ापे की इस दहलीज पर।
गर्मी की छुट्टी, आम का बगीचा
खेतो में काम करते मजदूर, मिट्टी में लोढ़ते उनके बच्चें
कपड़े उतार, तालाब में तैरते बच्चों की
झुण्ड, रोक नही पाता अपने-आप को
उतार फेकता, अपना वस्त्र, कुद जाता तालाबों में
आजाद पंक्षी की तरह, वगैर कुछ सोचे
ढूंढ़ता हुं, कहां खो गया, मेरा बचपन
बुढ़ापे की इस दहलीज पर।
सब कुछ छोड़ आया, अपने गावों में
यह सोचकर, कामयाब होकर लौटूंगा
अपने गांव, फिर से आम के बगीचे में
मन-भर तैरूंगा, तालाब में, खेलूंगा दोस्तों के साथ
इसी उम्मीद में, कब गुजर गया
बचपन-जवानी, अब ढूंढ़ता हूं
कहां खो गया, मेरा बचपन।
बुढ़ापे की इस दहलींज पर।

पुछता है बेटा, पापा क्यों चुप हो
अकसर आप टेंनशन में, क्यों दिखते हो
बात-बात पर क्यों, चिखतें हो।
मकान, दुकान, गाड़ी, सभी कुछ है आपके पास
फिर पहले कि तरह, क्यों नहीं हंसते हो।
पिता के खोने का गम, मां की बिगड़ती सेहत
भाई-बहनों, परिवार से, जुदा रहने का गम
बच्चों के भविष्य की चिंता, पति-पत्नी की बढ़ती उम्र
देश में बढ़ती, महंगाई, भ्रष्टाचार, परिवार का बढ़ता खर्च
चिंता बढ़ा, चिता तैयार कर रही है
क्या बताउ , उस मासूम को
जिसका बचपन, अभी शुरू हुई है।

ढूंढ़ता हुं, कहां खो गया, मेरा बचपन
बुढ़ापे की इस दहलीज पर।

......ललित 'सुमन'