महंगाई को एक बार पिफर दो अंकों में पहुंचाने को बेताब है। बृहस्पतिवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक गत 30 जुलाई को महंगाई दर बढ़कर 9.90 प्रतिशत हो गयी है, जो 11 जून को 9.13 प्रतिशत ही थी। महंगाई दर के पुनः दो अंकों में पहुंचने की बेताबी की पुष्टि खुद भारतीय रिजर्व बैंक के उस सर्वे से भी होती है जो बताता है कि इस साल की बात तो छोडि़ए, अगले साल जून तक भी महंगाई से कोई राहत नहीं मिलने वाली। यही नहीं, सर्वे के मुताबिक तो महंगाई दर 13 प्रतिशत तक जा सकती है। यह सही है कि रोजमर्रा की जिंदगी में हर रोज बेलगाम महंगाई की मार झेल रहे आदमी को इसकी प्रहारक क्षमता के आकलन के लिए न तो सरकार द्वारा जारी किये जाने वाले इन आंकड़ों की जरूरत है और न ही भारतीय रिजर्व बैंक के किसी सर्वे की, लेकिन ये आंकड़े और सर्वे हमारी सरकार के नीति-नियंताओं की कलई अवश्य खोलते हैं। यह आश्चर्य ही नहीं, शर्म की भी बात है कि वित्तमंत्राी से लेकर प्रधनमंत्राी तक पिछले तीन साल से महंगाई से राहत की नयी-नयी समय सीमाएं बताते रहे हैं, लेकिन इसके वायदे वपफा तक नहीं हो पाये। खुद सरकार के आंकड़े और भारतीय रिजर्व बैंक का सर्वे तो बताता है कि हमारे हुक्मरानों के ये वायदे अभी लगभग एक साल तक और भी वपफा नहीं होंगे। इसके कारण समझ पाना भी मुश्किल नहीं होना चाहिए। सरकार भले ही महंगाई नियंत्राण के लिए अनेक प्रभावी कदम उठाये जाने के दावे करे, पर सच तो यही है कि भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अपनी दरों में बदलाव और ट्टण दरों में वृ(ि के अलावा कोई कारगर कदम आज तक उठाया ही नहीं गया है। हां, पहले से ही आम आदमी की जिंदगी में आग लगा रही महंगाई पर तेल छिड़कने के लिए कई बार पेट्रोलियम पदार्थाें की कीमतों में रेकाॅर्ड वृ(ि अवश्य कर दी गयी है। इसलिए हैरत नहीं चाहिए कि ठीक पंद्रहवीं लोकसभा के चुनावों के वक्त महंगाई की लगाम थोड़ी थामकर एक और कार्यकाल का जनादेश पाने के बाद मनमोहन सिहं सरकार संवेदहीनता के साथ कहने लगे हैं कि विकास होगा तो महंगाई बढ़ेगी ही तथा उसके पास महंगाई पर काबू पाने के लिए कोई जादू की छड़ी नहीं है। जादू की छड़ी तो किसी भी सरकार के पास किसी भी समस्या से निजात पाने-दिलाने के लिए नहीं होती है, पिफर भी सरकारें उनसे पार पा लेती हैं, क्योंकि उनमें वैसा करने की इच्छाशक्ति होती है। दरअसल खासकर महंगाई के मोर्चे पर मनमोहन सिहं सरकार की सबसे बड़ी समस्या यही है कि इच्छाशक्ति का अभाव नजर आता है। वर्ष 2008 में जब महंगाई बढ़ना शुरू हुई थी, तब से लेकर सरकार उसके कारण और बहाने तो बदलती रही है, पर उस पर काबू पाने की कोई रणनीति नहीं बना पायी। कभी महंगाई का ठीकरा खराब मानसून के सिर पफोड़ा गया तो कभी कम उत्पादन के। कभी मनमोहन सिंह के मोंटेक सिंह आहलूवालिया सरीखे सिपहसालारों ने संवेदनशीलता को ताक पर रख कर इसके लिए आम आदमी की बढ़ती क्रय-शक्ति को ही जिम्मेदार ठहरा दिया तो कांग्रेस के प्रवक्ता इसका दोष राज्य सरकारों के सिर पड़ते रहे, बिना इस बात का अहसास किये कि कई राज्यों में उनके दल की भी सरकारें हैं और वहां भी महंगाई उतनी ही बेलगाम है।
केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंध्न की सरकार का नेतृत्व कांग्रेस कर रही है। इसलिए कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांध्ी महंगाई पर चिंता व्यक्त करते हुए प्रधनमंत्राी मनमोहन सिंह को पत्रा लिखकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझती रही हैं और मनमोहन सिंह महंगाई नियंत्राण की जरूरत पर जोर देकर, पर यह कोई नहीं बताता कि परिणाम देने की जिम्मेेदारी किसकी है ?वर्ष 2004 में जब पाठ आठ साल के लंबे अंतराल के बाद कांग्रेस केंद्रीय सत्ता में वापस लौट पायी थी तब नारा दिया गया था कि आम आदमी का हाथ, कांग्रेस के साथ, पर संवेदनशील राजनीति का छलावा देखिए कि उसी आम आदमी का जीवन इन सालों में सबसे ज्यादा दुश्वार हो गया है। दरअसल जिस दाल, चावल, आटा, आलू, प्याज को कभी आम आदमी के जीवनयापन का जरिया बताया गया था, वह पिछले चार सालों में मध्यम वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग की पहंुच से भी बाहर चले गये हैं। सरकार की इच्छाशक्ति ही नहीं मंशा पर भी सवाल इससे खड़े हो जाते हैं कि एक और खाद्यान्न के दाम घरेलू बाजार में बेलगाम हैं तो दूसरी ओर खाद्यान्न सरकारी गोदामों में और उनके बाहर उचित रखरखाव के अभाव में पड़ा सड़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट तक सरकार को यह नसीहत दे चुका है कि रखरखाव के अभाव में सड़ रहे खाद्यान्न गरीबों में मुफ्रत बांट दिया जाये, लेकिन आम आदमी के साथ अपने हाथ का दम भरने वाली सरकार को खाद्यान्न का सड़ जाना गवारा है, पर उन लोगों को बांट देना नहीं, जो भुखमरी के कगार पर हैं। दरअसल बृहस्पतिवार को जिस दिन सरकार ने महंगाई दर के पिफर से दो अंकों के करीब पहुंचने के आंकड़े जारी किये, उसी दिन केंद्रीय वित्तमंत्राी का संसद के अंदर बयान भी सरकार की संवेदनहीनता की ही पुष्टि करता है। वित्तमंत्राी प्रणव मुखर्जी ने अपने प्रधनमंत्राी की आर्थिक सोच के अनुरूप ही राग अलापा कि विकास होगा तो महंगाई भी होगी, पर यह नहीं बताया कि यह विकास किन लोगों का हो रहा है और महंगाई की मार किन लोगों पर पड़ रही है ?वित्तमंत्राी ने कुछ पुराने आंकड़े भी याद दिलाये, जब महंगाई दर 16 या 20 प्रतिशत तक पहुंच गयी थी। महंगाई पर नियंत्राण में नाकाम सरकार के वित्तमंत्राी की ऐसी संवेदनहीन बयानबाजी तो जनता को आश्वस्त करने के बजाय और डरायेगी ही। बेहतर होगा कि सरकार महंगाई नियंत्राण के लिए उठाये गये अपने तथाकथित उपायों की समीक्षा कर कोई दीर्घकालीन ठोस रणनीति बनाये।
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