Wednesday, 17 August 2011

स्वतंत्राता दिवस पर भ्रष्टाचार की छाया


यह एक निर्विवाद सच है कि स्वाध्ीनता दिवस पर इस बार अगर कोई छाया पड़ रही है, तो वह है राष्ट्रव्यापी भ्रष्टाचारियों की छाया। पिछले 64 वर्षों में भ्रष्टाचार के मामलों में जो कुछ सामान्य था, वह 2011 में विशिष्ट होकर उभरा है। इसलिए यह बहुत स्वाभाविक और तार्किक ही है कि लालकिले के प्राचीर से आठवीं बार देश को संबोध्ति करने वाले प्रधनमंत्राी मनमोहन सिंह के भाषण और उसकी पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति प्रतिज्ञा पाटिल के राष्ट्र के नाम संबोध्न में भ्रष्टाचार का मुद्दा केंद्रीय होकर उभरा। लेकिन हम देखते आए हैं कि 15 अगस्त पर हमारे प्रधनमंत्राी और राष्ट्रपतियों के भाषण इध्र मात्रा रस्म अदायगी बन कर रह गए हैं, जिनमें दोहराए गए संकल्प प्रायः अगले ही दिन भुला दिए जाते हैं, इन संबोध्नों में पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसी राजनीतिक उफष्मा और इंदिरा गांध्ी जैसी व्याकुल आग लगातार विलुप्त होती चली गई है। अब तो भाषण भी लिखित पढ़े जाने लगे हैं जो प्रायः बोझिल प्रवाह में नीरस बन कर रह जाते हैं। आजादी के मूल्यों से राष्ट्र के जीवन में प्राण पूफंकना अब दुर्लभ किस्म का काम हो गया है और लगता है जैसे मात्रा एक अनुष्ठान को पूरा करने की ही कोशिश की जा रही है। इसलिए जब भ्रष्टाचार को खत्म करने की वचनब(ता दोहराई जाती है तब देशवासियों को लगता है कि जैसे कोई तोता रटी-रटाई बातें सुना रहा हो। इस बार भी प्रधनमंत्राी मनमोहन सिंह भ्रष्टाचार के मुद्दे का अपने भाषण में स्पर्श करते हुए कहना नहीं भूले कि सरकार के पास कोई जादू की छड़ी नहीं है मगर सरकार भ्रष्टाचार के मामले में पंफसे उफंचे से उफंचे आदमी पर भी कानूनी कार्रवाई करने में नहीं हिचकिचाएगी। पं. नेहरू और इंदिरा गांध्ी भी ‘जादू की छड़ी’ नहीं होने की बात कहते थे। रविवार को राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने कहा था कि भ्रष्टाचार एक ऐसा कैंसर है जो देश के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक जीवन को प्रभावित कर रहा है मगर इसे हटाने का कोई एक रास्ता नहीं हो सकता बल्कि इसके लिए जरूरी है कि विभिन्न स्तरों पर पारदर्शिता और जवाबदेही का एक तंत्रा स्थापित किया जाए और उसे लागू किया जाए। उन्होंने इशारे में यह भी कहा कि किसी भी मुद्दे पर देश में बहस-मुबाहिसें चलें, संवाद हों या विमर्श हो, मगर कानून बनाने का काम संसद का ही है जिसके अध्किारों का हनन नहीं होना चाहिए। प्रधनमंत्राी मनमोहन सिंह ने तो इससे एक कदम आगे जाकर जन लोकपाल विध्ेयक की मांग कर रहे गांध्ीवादी कार्यकर्ता अण्णा हजारे और नागरिक समाज के उनके सहयोगियों का नाम लिए बिना यह चेतावनी भी दे दी कि वे आमरण अनशन न करें। भ्रष्टाचार से लड़ने का इस सरकार का रिकार्ड देश की जनता के सामने है, जो यह जानती है कि अगर सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप न करता तो कोई राजा, कोई कनिमोझि, कोई कलमाड़ी जेल के सींखचों के पीछे न पहंुचता और कोई मारन इस्तीपफा देने को मजबूर नहीं होता। आज काॅमनवेल्थ गेम्स के आयोजन में दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार को नियंत्राक एवं लेखा महापरीक्षक ;कैगद्ध ने अपनी रिपोर्ट में भ्रष्टाचार अनियमितताओं का दोषी पाया है और प्रतिपक्ष उनके इस्तीपेफ की मांग कर रहा है, मगर पार्टी टस से मस होने को तैयार नहीं है। सीएजी की रिपोर्ट से इस्तीपेफ का कानूनी आधर न हो, लेकिन नैतिक कारण बन सकता है। इसके खिलापफ प्रदर्शन करने वाले भारतीय जनता युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं पर पुलिस ने दिल्ली में लाठियां चलाईं। दूसरी ओर सरकार ने जन लोकपाल बिल के लिए आमंत्राण अनशन की घोषणा करने वाले अण्णा हजारे के खिलापफ अभियान छेड़ दिया है।
कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी ने तो अण्णा हजारे को भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा बता दिया। टांड पर पड़े हुए ठंडे बस्ते से जस्टिस ;सेवानिवृत्तद्ध पी. बी. सावंत की 2005 की पुरानी रिपोर्ट निकालकर मनीष तिवारी ने अण्णा हजारे के व्यक्तित्व पर कालिख पोतने की कोशिश की कि उन्होंने अपने ट्रस्ट के पैसे से 2 लाख 20 हजार रु. की रकम निकालकर अपना जन्म दिवस समारोह मनाया था। तथ्य यह है कि इस रिपोर्ट के बाद गठित की गई महाराष्ट्र सरकार की शुभटणकर समिति अण्णा को क्लीन चिट दे चुकी है। इसलिए अण्णा ने सरकार को चेतावनी दी कि अगर में भ्रष्ट हूं तो मेरे खिलापफ एपफ. आई. आर. दर्ज की जाए। उसके अगले ही रोज दिल्ली पुलिस ने अण्णा हजारे को दिल्ली गेट के पास स्थित जयप्रकाश नारायण पार्क में दी गई अनशन की अनुमति वापस ले ली और पूरे इलाके में धरा 144 लगा दी। इस पृष्ठभूमि में अण्णा हजारे और उनके समर्थकों को गिरफ्रतार करने की पुलिस की ध्मकी वास्तविक लगने लगी है। सापफ है कि केंद्र सरकार जवाबी कार्रवाई पर उतर आई है और जो बर्ताव दिल्ली पुलिस ने बाबा रामदेव के निहत्थे समर्थकों पर दिल्ली के रामलीला मैदान में किया था, उसी तरह के प्रारंभिक तेवर इस बार भी नजर आ रहे हैं। यह सारा घटनाक्रम इस बात को रेखांकित करता है कि भ्रष्टाचार को दूर करने के मामले में सरकार के कदम लड़खड़ाए हुए हैं। सरकार ने लोकपाल बिल का जो प्रारूप संसद में पेश किया है, उसमें अण्णा टीम द्वारा रखी गई बड़ी मांगों में से एक भी शामिल नहीं है। न तो प्रधनमंत्राी का पद, न न्यायपालिका और न संसद में सांसद का आचरण इस बिल के दायरे में आता है। न ही रोज-रोज कदम-कदम पर भ्रष्टाचार का सामना करने वाले आम नागरिक के लिए बिल में कोई प्रावधन है। सरकार सीबीआई को भी लोकपाल के अध्ीन लाने को तैयार नहीं है। इसलिए अण्णा खेमे का तर्क है कि सरकार के प्रारूप से तो एक कागजी शेर जैसी ही लोकपाल की संस्था अस्तित्व में आएगी। संसद की स्थायी समिति सरकार के मसौदे में बड़े परिवर्तन कर सकती है, बशर्ते समिति में शामिल प्रतिपक्ष के नेता भी लोकपाल को अध्किाध्कि शक्तिशाली बनाना चाहते हों। समिति के समक्ष अण्णा टीम का प्रस्तावित जन लोकपाल विध्ेयक भी रहेगा। सच यह है कि सरकार के रुख से प्रतिपक्ष भी ढुलमुल रवैया अपनाए हुए है। भाजपा खुलकर सरकार का विरोध् कर रही है और आंदोलन में अण्णा का समर्थन भी करती है। लेकिन विध्ेयक में उन कड़े प्रावधनों पर अपने पत्ते नहीं खोल रही। इस तरह संपूर्ण राजनीतिक व्यवस्था भ्रष्टाचार पर कृत्रिम आंसू बहा रही है।

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